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छत्तीसगढ़ - छत्तीसगढ़ में RTI का गला घोंटा गया: पारदर्शिता नहीं, सत्ता को बचाने का औज़ार बना प्रशासन

 

छत्तीसगढ़ में RTI का गला घोंटा गया: पारदर्शिता नहीं, सत्ता को बचाने का औज़ार बना प्रशासन

संपादकीय | जयप्रकाश सिन्हा

छत्तीसगढ़ में सूचना का अधिकार अधिनियम–2005 अब अधिकार नहीं, बल्कि एक छलावा बनकर रह गया है। जिस कानून को लोकतंत्र का सबसे मजबूत हथियार कहा गया था, उसे राज्य सरकार और प्रशासनिक तंत्र ने मिलकर धीरे-धीरे दमघोंटू मौत दे दी है। यह लापरवाही नहीं है, यह अक्षमता नहीं है—यह जानबूझकर की गई निष्क्रियता है।

वर्तमान मे यह, सूचना आयोग नहीं, सूचना रोकने का आयोग बन गया है

वर्तमान मे राज्य सूचना आयोग आज उस संस्था का नाम है, जहां

  • अपीलें सुनवाई की प्रतीक्षा में बूढ़ी हो जाती हैं,
  • फैसले आने से पहले ही शिकायतकर्ता थककर हार मान लेता है,
  • और भ्रष्ट अधिकारी निश्चिंत होकर फाइलें दबाए बैठा रहता है।

सूचना आयुक्तों की नियुक्ति नहीं करना कोई प्रशासनिक भूल नहीं, बल्कि RTI को निष्प्रभावी करने की रणनीति है। सवाल सीधा है—
जब सरकार पारदर्शिता चाहती ही नहीं, तो आयुक्त क्यों नियुक्त करेगी?

एक साल बाद तारीख देना—न्याय नहीं, मज़ाक

RTI अपीलों में एक-एक सुनवाई के बीच 12 से 18 महीने का अंतर दिया जाना किस कानून, किस संविधान और किस लोकतंत्र में जायज़ है?
यह देरी नहीं है, यह साफ संदेश है—

“सूचना मत मांगो, वरना सालों तक भटकते रहो।”

PIO और अपीलीय अधिकारी: कानून से अनभिज्ञ या जानबूझकर अपराधी?

प्रदेश के अधिकांश विभागों में जन सूचना अधिकारी ऐसे बैठे हैं जिन्हें

  • RTI की धाराएँ नहीं मालूम,
  • समय सीमा का मतलब नहीं पता,
  • और दंड का कोई भय नहीं।

प्रथम अपीलीय अधिकारी, जो नागरिक को न्याय देने के लिए होते हैं, वही अपीलों को रद्द करने की मशीन बन चुके हैं। यह अक्षमता नहीं, यह संरक्षण है—भ्रष्टाचार को दिया गया खुला संरक्षण।

RTI कार्यकर्ता हतोत्साहित, भ्रष्ट तंत्र बेखौफ

जब सूचना पाने का अधिकार ही निष्क्रिय कर दिया जाए, तो

  • घोटाले सुरक्षित रहते हैं,
  • फाइलें बंद रहती हैं,
  • और जवाबदेही मर जाती है।

RTI कार्यकर्ता आज छत्तीसगढ़ में सिस्टम से नहीं, सिस्टम के खिलाफ लड़ रहे हैं। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक राज्य के लिए शर्मनाक है।

अन्य राज्य आगे, छत्तीसगढ़ जानबूझकर पीछे

देश के कई राज्यों में सूचना आयोग सक्रिय हैं, आयुक्त पूरे हैं, और अधिकारी दंडित होते हैं।
तो सवाल उठता है—
क्या छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार ज़्यादा प्यारा है, पारदर्शिता नहीं?


उदाहरण

छत्तीसगढ़ में RTI व्यवस्था का नग्न सच: एक प्रकरण, जो पूरे सिस्टम की पोल खोल देता है


छत्तीसगढ़ में RTI अधिनियम के हश्र को यदि एक उदाहरण में समझना हो, तो राज्य सूचना आयोग अपील प्रकरण क्रमांक A/4944/2023 अपने आप में पूरा आरोपपत्र है। यह प्रकरण न केवल पुलिस प्रशासन की लापरवाही उजागर करता है, बल्कि राज्य सूचना आयोग की भयावह निष्क्रियता को भी बेनकाब करता है।

पहला स्तर: जन सूचना अधिकारी का खुला कानून-उल्लंघन

जन सूचना अधिकारी, थाना कुरुद, जिला धमतरी (छ.ग.)

RTI आवेदन दिनांक: 19 अप्रैल 2023

स्थिति: किसी भी प्रकार की जानकारी नहीं दी गई

सबसे गंभीर तथ्य: सूचना न देने का कोई कारण तक नहीं बताया गया


यह सीधा-सीधा RTI अधिनियम की धारा 7 का उल्लंघन है।
यहाँ न जवाब है, न कारण, न माफी—साफ संदेश है कि

> “सूचना मांगने से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता।”



दूसरा स्तर: प्रथम अपीलीय अधिकारी का गोलमोल जवाब

प्रथम अपीलीय अधिकारी, पुलिस SDOP कुरुद, जिला धमतरी (छ.ग.)

अपील दिनांक: 22 मई 2023

जवाब: “मांगी गई जानकारी वर्तमान में उपलब्ध नहीं है”


लेकिन सवाल यह है कि
👉 क्यों उपलब्ध नहीं है?
👉 कब और कैसे गायब हुई?
👉 किसकी जिम्मेदारी है?

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि
यही जानकारी पूर्व में दिनांक 19 जुलाई 2017 को
पत्र क्रमांक /जसुअ/45/17 के माध्यम से
₹54 शुल्क लेकर दी जा चुकी है।

यानि—

2017 में सूचना मौजूद थी

2023 में वही सूचना “गायब” हो गई

और यह बताने वाला कोई नहीं कि सूचना कहाँ गई? किसने हटाई?


यह लापरवाही नहीं, बल्कि रिकॉर्ड से छेड़छाड़ का गंभीर संदेह पैदा करता है।

तीसरा स्तर: राज्य सूचना आयोग—जहाँ न्याय दम तोड़ देता है

द्वितीय अपील: राज्य सूचना आयोग, छत्तीसगढ़

अपील दायर: 02 अगस्त 2023

प्रथम सुनवाई तय: 02 अगस्त 2024
➡️ अंतर: पूरा 1 वर्ष

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

02 अगस्त 2024 को
पीठासीन अधिकारी शासकीय प्रवास पर होने के कारण
सुनवाई स्थगित कर दी गई।

नई तारीख दी गई—
👉 26 फरवरी 2026

यानि—

RTI आवेदन: अप्रैल 2023

संभावित सुनवाई: फरवरी 2026
➡️ लगभग 3 वर्ष


यह न्याय नहीं है।
यह नागरिक को थकाकर चुप कराने की प्रणाली है।

यह उदाहरण नहीं, सिस्टम का चेहरा है
यह मामला कोई अपवाद नहीं है। यह छत्तीसगढ़ में RTI व्यवस्था की रोज़मर्रा की सच्चाई है—

अधिकारी सूचना नहीं देते
• अपीलीय अधिकारी ढुलमुल जवाब देते हैं
• सूचना आयोग सालों तक सुनवाई नहीं करता

और अंततः
👉 भ्रष्टाचार सुरक्षित रह जाता है
👉 जवाबदेही मर जाती है

सूचना आयोग की वेबसाइट पर मौजूद, फिर भी कार्रवाई नहीं

यह पूरा प्रकरण राज्य सूचना आयोग की वेबसाइट पर दर्ज है।
अर्थात—

मुख्यमंत्री से सीधा सवाल

माननीय मुख्यमंत्री से प्रदेश की जनता यह जानना चाहती है—

  • सूचना आयुक्तों की नियुक्ति क्यों नहीं हो रही?
  • वर्षों से लंबित अपीलों की जिम्मेदारी कौन लेगा?
  • RTI कानून तोड़ने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?

यदि सरकार सचमुच “सुशासन” का दावा करती है, तो RTI को कमजोर क्यों किया जा रहा है?

RTI बचेगा तो लोकतंत्र बचेगा 

यह स्पष्ट है कि

RTI को कमजोर करना = लोकतंत्र को कमजोर करना

यदि अभी भी सरकार नहीं जागी, तो यह इतिहास में उस शासन के रूप में दर्ज होगी जिसने
जनता से सूचना छीन ली और भ्रष्टाचार को खुली छूट दे दी।

News मितान बंधू सत्ता से सवाल पूछता रहेगा,
भ्रष्टाचार को बेनकाब करता रहेगा,
और RTI कार्यकर्ताओं की आवाज़ बनकर खड़ा रहेगा।


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