गिनी पिग पालन
गिनी पिग (Guinea Pig) एक छोटा, शांत स्वभाव वाला स्तनधारी जीव है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में Cavia porcellus कहा जाता है। मूल रूप से यह दक्षिण अमेरिका का जीव है, लेकिन आज यह विश्व के कई देशों में पालतू पशु, अनुसंधान एवं सीमित व्यवसायिक उपयोग के लिए पाला जा रहा है। भारत में गिनी पिग पालन अभी शुरुआती अवस्था में है, किंतु शहरी क्षेत्रों, शोध संस्थानों और पालतू पशु बाजार में इसकी मांग धीरे-धीरे बढ़ रही है।
यह रिपोर्ट गिनी पिग पालन की प्रक्रिया, उपयोग, आर्थिक संभावनाओं और इससे जुड़ी चुनौतियों पर केंद्रित है।
गिनी पिग का परिचय
- वैज्ञानिक नाम: Cavia porcellus
- औसत आयु: 5–7 वर्ष
- वजन: 700 ग्राम से 1.2 किलोग्राम
- स्वभाव: अत्यंत शांत, डरपोक और सामाजिक
- रंग/प्रजाति: सफेद, भूरे, काले, मिश्रित रंग; एबीसिनियन, पेरूवियन, अमेरिकन आदि
गिनी पिग समूह में रहना पसंद करता है और इसे अधिक देखभाल व साफ-सफाई की आवश्यकता होती है।
गिनी पिग पालन की विधि
1. आवास व्यवस्था
- गिनी पिग को लकड़ी या लोहे के जालीदार पिंजरे में रखा जा सकता है।
- पिंजरा हवादार, सूखा और सीधे धूप या ठंडी हवा से सुरक्षित होना चाहिए।
- फर्श पर भूसा, लकड़ी की बुरादे या सूखी घास बिछानी चाहिए।
- सप्ताह में कम से कम 2 बार सफाई आवश्यक है।
2. आहार प्रबंधन
गिनी पिग शाकाहारी होता है। इसका आहार संतुलित और ताजा होना चाहिए।
- हरी घास (नेपियर, दूब)
- सब्जियां – गाजर, पत्तागोभी, पालक (सीमित मात्रा में)
- फल – सेब, अमरूद (कम मात्रा)
- सूखा चारा और पेलेट फीड
- स्वच्छ पेयजल हमेशा उपलब्ध होना चाहिए
विशेष ध्यान: गिनी पिग को विटामिन C की आवश्यकता होती है, इसकी कमी से बीमारी हो सकती है।
3. प्रजनन व्यवस्था
- एक नर के साथ 4–5 मादा रखी जा सकती हैं।
- गर्भकाल लगभग 65–70 दिन का होता है।
- एक बार में 2–4 बच्चे जन्म लेते हैं।
- बच्चे जन्म के कुछ घंटों में ही चलने-फिरने लगते हैं।
गिनी पिग के प्रमुख उपयोग
1. पालतू पशु के रूप में
- शहरी क्षेत्रों में गिनी पिग को बच्चों और परिवारों द्वारा पालतू पशु के रूप में पाला जाता है।
- यह काटता नहीं है, शोर नहीं करता और सीमित स्थान में आसानी से रह सकता है।
2. वैज्ञानिक एवं चिकित्सा अनुसंधान में
- गिनी पिग का उपयोग जैविक, औषधीय और वैक्सीन अनुसंधान में किया जाता है।
- एलर्जी, श्रवण शक्ति, संक्रमण रोगों पर शोध में इसका विशेष महत्व है।
- कई मेडिकल कॉलेज और रिसर्च लैब गिनी पिग का पालन करती हैं।
3. शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों में
- स्कूल, कॉलेज और पशु चिकित्सा संस्थानों में छात्रों को प्रायोगिक ज्ञान देने के लिए गिनी पिग का उपयोग किया जाता है।
4. सीमित मांस उपयोग (विदेशों में)
- दक्षिण अमेरिका के कुछ देशों (जैसे पेरू, इक्वाडोर) में गिनी पिग का मांस प्रोटीन स्रोत के रूप में उपयोग होता है।
- भारत में इसका मांस उपयोग लगभग नहीं के बराबर है और सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं है।
5. पालतू पशु व्यापार
- पालतू जानवरों की दुकानों में गिनी पिग की अच्छी मांग है।
- अच्छे नस्ल के गिनी पिग 2,000 से 5,000 रुपये प्रति जोड़ा तक बिकते हैं।
रोग एवं स्वास्थ्य प्रबंधन
प्रमुख रोग
- विटामिन C की कमी (स्कर्वी)
- त्वचा रोग और फंगल संक्रमण
- श्वसन रोग
- दस्त और पेट संबंधी समस्याएं
बचाव उपाय
- संतुलित आहार
- नियमित सफाई
- बीमार पशु को अलग रखना
- पशु चिकित्सक की सलाह समय-समय पर लेना
आर्थिक संभावनाएं
- कम पूंजी में पालन संभव
- छोटे स्तर पर घर से व्यवसाय शुरू किया जा सकता है
- पालतू पशु बाजार और शोध संस्थानों में स्थायी मांग
- स्वरोजगार का अच्छा विकल्प, विशेषकर युवाओं और महिलाओं के लिए
गिनी पिग पालन भारत में एक नया लेकिन संभावनाओं से भरा क्षेत्र है। पालतू पशु, अनुसंधान एवं शिक्षा के क्षेत्र में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। यदि सही प्रशिक्षण, स्वास्थ्य प्रबंधन और बाजार संपर्क उपलब्ध हो, तो गिनी पिग पालन छोटे किसानों और शहरी युवाओं के लिए एक लाभदायक एवं सुरक्षित व्यवसाय बन सकता है।

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