मछली पालन
स्टेप 1: मछली पालन के लिए स्थान और भूमि का चयन
मछली पालन शुरू करने से पहले सबसे पहला और महत्वपूर्ण कार्य उपयुक्त स्थान का चयन करना होता है। जिस स्थान पर तालाब बनाया जाना है, वहाँ वर्ष भर या कम से कम 8–10 महीने पानी उपलब्ध रहना चाहिए। भूमि ऐसी होनी चाहिए जिसमें पानी रोकने की क्षमता हो, यानी मिट्टी चिकनी या दोमट हो। रेतीली भूमि में पानी जल्दी रिस जाता है, इसलिए ऐसी भूमि उपयुक्त नहीं मानी जाती। तालाब ऐसी जगह होना चाहिए जहाँ तक सड़क की पहुँच हो, ताकि मछली बेचने में परेशानी न हो। बिजली और साफ पानी की उपलब्धता भी मछली पालन के लिए लाभकारी मानी जाती है।
स्टेप 2: तालाब का निर्माण या सुधार
यदि नया तालाब बनाया जा रहा है तो उसकी गहराई सामान्यतः 5 से 6 फीट रखी जाती है। तालाब की मेड़ मजबूत होनी चाहिए ताकि बरसात में कटाव न हो। पुराने तालाब की स्थिति में उसकी पूरी सफाई आवश्यक होती है। तालाब से झाड़ियाँ, घास, कचरा और कीचड़ हटाया जाता है। इसके बाद तालाब को 7 से 10 दिन तक धूप में सुखाया जाता है। इससे हानिकारक जीवाणु, कीड़े और रोग फैलाने वाले तत्व नष्ट हो जाते हैं।
स्टेप 3: तालाब की मिट्टी और पानी का उपचार
तालाब सूखने के बाद उसमें चूना डाला जाता है। चूना डालने का उद्देश्य पानी की अम्लीयता को संतुलित करना और हानिकारक जीवाणुओं को समाप्त करना होता है। सामान्यतः प्रति हेक्टेयर 200 से 300 किलोग्राम चूना डाला जाता है, लेकिन यह मात्रा मिट्टी की प्रकृति पर निर्भर करती है। इसके बाद तालाब में गोबर खाद या कम्पोस्ट खाद डाली जाती है। इसका उद्देश्य तालाब में प्राकृतिक भोजन जैसे प्लवक (Plankton) पैदा करना होता है, जो मछलियों के लिए शुरुआती भोजन का काम करता है। खाद डालने के 7 से 10 दिन बाद तालाब में पानी भर दिया जाता है।
स्टेप 4: मछली प्रजाति का चयन
सफल मछली पालन के लिए सही प्रजातियों का चयन अत्यंत आवश्यक होता है। भारत में सामान्यतः मिश्रित मछली पालन किया जाता है। इसमें ऐसी मछलियों को चुना जाता है जो तालाब की अलग-अलग परतों में भोजन करती हैं। कतला तालाब की ऊपरी सतह से भोजन करती है, रोहू बीच की परत से और मृगल नीचे की सतह से भोजन करती है। इसके साथ ग्रास कार्प और कॉमन कार्प को भी शामिल किया जाता है। इससे तालाब का पूरा उपयोग होता है और उत्पादन बढ़ता है।
स्टेप 5: मछली बीज (फिंगरलिंग्स) की खरीद
मछली पालन की सफलता सीधे-सीधे बीज की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। बीज हमेशा सरकारी या प्रमाणित हैचरी से ही खरीदना चाहिए। स्वस्थ बीज वही माना जाता है जो पानी में तेज़ी से तैरता हो, उसका रंग चमकदार हो और शरीर पर कोई घाव या सफेद धब्बे न हों। सामान्यतः 10 से 15 सेंटीमीटर आकार के बीज तालाब में डालने के लिए उपयुक्त होते हैं। प्रति हेक्टेयर लगभग 8,000 से 10,000 बीज डाले जाते हैं।
स्टेप 6: बीज डालने की सही विधि
बीज सीधे तालाब में नहीं डालना चाहिए। पहले बीज को तालाब के पानी के तापमान के अनुसार ढालना आवश्यक होता है। इसके लिए बीज को कुछ समय तक तालाब के पानी में रखे गए बर्तन में रखा जाता है, ताकि तापमान का अंतर कम हो जाए। इसके बाद धीरे-धीरे बीज तालाब में छोड़े जाते हैं। इससे बीज को झटका नहीं लगता और मृत्यु दर कम होती है।
स्टेप 7: मछलियों को आहार देना
मछलियों की तेज़ और स्वस्थ वृद्धि के लिए संतुलित आहार अत्यंत आवश्यक है। शुरुआती अवस्था में चावल की भूसी और तेल खली का मिश्रण दिया जाता है। आधुनिक मछली पालन में बाजार में उपलब्ध रेडीमेड पैलेट फीड का भी उपयोग किया जाता है। आहार की मात्रा मछलियों के कुल वजन का लगभग 3 से 5 प्रतिशत होती है। आहार दिन में दो बार सुबह और शाम दिया जाना चाहिए। अधिक आहार देने से पानी खराब हो सकता है, इसलिए संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
स्टेप 8: पानी की गुणवत्ता और देखरेख
तालाब के पानी की गुणवत्ता पर नियमित निगरानी आवश्यक होती है। पानी का रंग हल्का हरा होना अच्छा माना जाता है। यदि पानी बहुत गहरा हरा या बदबूदार हो जाए तो यह संकेत है कि तालाब में गड़बड़ी है। ऐसी स्थिति में आहार कम कर देना चाहिए और ताजा पानी डालना चाहिए। पानी का पीएच स्तर 7 से 8 के बीच होना चाहिए। ऑक्सीजन की कमी से मछलियाँ सतह पर आने लगती हैं, ऐसी स्थिति में तुरंत पानी में हलचल या एरिएटर का उपयोग करना चाहिए।
स्टेप 9: रोगों से बचाव और उपचार
मछली पालन में रोग सबसे बड़ा नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए रोकथाम सबसे बेहतर उपाय है। तालाब में साफ-सफाई बनाए रखना, सही मात्रा में आहार देना और समय-समय पर चूना या पोटाश का प्रयोग करना लाभकारी होता है। यदि मछलियों में असामान्य व्यवहार दिखाई दे, जैसे सुस्ती, रंग बदलना या सतह पर तैरना, तो तुरंत मत्स्य विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।
स्टेप 10: मछली की वृद्धि की निगरानी
हर 15–20 दिन में कुछ मछलियाँ पकड़कर उनका वजन और आकार देखा जाता है। इससे यह पता चलता है कि मछलियाँ सही तरीके से बढ़ रही हैं या नहीं। यदि वृद्धि धीमी हो तो आहार या प्रबंधन में सुधार किया जाता है।
स्टेप 11: मछली की कटाई (Harvesting)
लगभग 8 से 10 महीने में मछलियाँ बिक्री योग्य आकार की हो जाती हैं। कटाई चरणबद्ध तरीके से की जा सकती है। बड़ी मछलियाँ पहले निकाल ली जाती हैं और छोटी मछलियों को बढ़ने के लिए छोड़ दिया जाता है। इससे लगातार आय प्राप्त होती रहती है।
स्टेप 12: विपणन और बिक्री
मछलियों को स्थानीय बाजार, मत्स्य मंडी, होटल, ढाबे और थोक व्यापारियों को बेचा जाता है। ताज़ी मछली का बाजार मूल्य अच्छा मिलता है। यदि किसान समूह बनाकर बिक्री करते हैं तो उन्हें और बेहतर दाम मिल सकता है।
स्टेप 13: लागत, आय और लाभ
सामान्यतः एक हेक्टेयर तालाब में मछली पालन की लागत 1.5 से 2 लाख रुपये आती है। सही प्रबंधन से 4 से 6 टन तक मछली उत्पादन संभव है। बाजार मूल्य के अनुसार 4 से 6 लाख रुपये तक की बिक्री हो सकती है, जिससे 2 से 4 लाख रुपये तक शुद्ध लाभ प्राप्त होता है।
स्टेप 14: सरकारी सहायता और सब्सिडी
सरकार मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत तालाब निर्माण, गहरीकरण, बायोफ्लॉक यूनिट, बीज, फीड और उपकरणों पर 40 से 60 प्रतिशत तक अनुदान देती है। इसके साथ ही मत्स्य किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से कम ब्याज पर ऋण सुविधा भी उपलब्ध कराई जाती है।
मछली पालन एक ऐसा व्यवसाय है जिसे सही जानकारी, वैज्ञानिक प्रबंधन और सरकारी योजनाओं के सहयोग से अत्यंत लाभकारी बनाया जा सकता है। यह व्यवसाय कम समय में आय देने के साथ-साथ ग्रामीण युवाओं और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


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