छत्तीसगढ़ में मखाना की खेती: धान के कटोरे से “सुपर फूड” उत्पादन की ओर बढ़ता राज्य
विशेष कृषि रिपोर्ट-
छत्तीसगढ़ को लंबे समय से “धान का कटोरा” कहा जाता है, लेकिन बदलती कृषि परिस्थितियों, बढ़ती लागत और सीमित लाभ के कारण अब किसान वैकल्पिक और उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इसी कड़ी में मखाना (Fox Nut) की खेती छत्तीसगढ़ के लिए एक नई और लाभकारी संभावना के रूप में सामने आ रही है। राज्य की जलवायु, भरपूर वर्षा, तालाबों और जलभराव वाले खेतों की उपलब्धता मखाना उत्पादन के लिए अनुकूल मानी जाती है।
मखाना क्या है और इसकी बढ़ती मांग क्यों
मखाना कमल कुल का जलीय बीज है, जिसे सुखाकर और भूनकर खाद्य रूप में उपयोग किया जाता है। यह देश-विदेश में एक पोषणयुक्त “सुपर फूड” के रूप में लोकप्रिय हो चुका है। व्रत, उपवास, आयुर्वेदिक चिकित्सा, आधुनिक डाइट प्लान और स्नैक्स उद्योग में मखाना की मांग लगातार बढ़ रही है।
बिहार परंपरागत रूप से मखाना उत्पादन में अग्रणी रहा है, लेकिन अब छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी इस दिशा में संभावनाएं तलाश रहे हैं।
छत्तीसगढ़ की जलवायु: मखाना के लिए क्यों अनुकूल
छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक परिस्थितियां मखाना की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं—
• औसत तापमान: 20°C से 35°C
• वार्षिक वर्षा: 1200–1400 मिमी
• पर्याप्त सतही जल और तालाब
• धान की खेती के कारण पहले से जलयुक्त खेत
• श्रमिकों की स्थानीय उपलब्धता
विशेषज्ञों के अनुसार राज्य के कई जिलों में मखाना की खेती बिना बड़े तकनीकी बदलाव के अपनाई जा सकती है।
मखाना की खेती की संपूर्ण प्रक्रिया
1. भूमि और जल स्रोत का चयन
मखाना की खेती के लिए 1 से 3 फीट गहरे पानी वाले क्षेत्र उपयुक्त होते हैं। इसके लिए—
पारंपरिक तालाब, ग्राम पंचायत के निस्तारी तालाब,
मनरेगा से बने फार्म पॉन्ड, धान की कटाई के बाद जलभराव वाले खेत , पॉलिथीन लाइनिंग वाले कृत्रिम तालाब का उपयोग किया जा सकता है।
2. बीज चयन और रोपण
• रोपण का उपयुक्त समय: फरवरी से मार्च
• प्रति एकड़ बीज मात्रा: 8–10 किलोग्राम
• बीज सीधे पानी में डाले जाते हैं
3. फसल की देखभाल
• जलस्तर 1–1.5 फीट बनाए रखना
• अनावश्यक खरपतवार हटाना
• रासायनिक खाद की आवश्यकता कम
• जैविक खाद से बेहतर परिणाम
4. फूल, फल और कटाई
• 3–4 महीने में पौधों का विस्तार
• जुलाई–अगस्त में फल बनते हैं
• अगस्त–सितंबर में कटाई
बीज पानी में डूबे रहते हैं, जिन्हें प्रशिक्षित श्रमिक गोताखोरी कर निकालते हैं
5. सुखाना और प्रोसेसिंग
• बीजों को धूप में सुखाया जाता है
• भट्ठी या मशीन से भूनकर “पॉप्ड मखाना” तैयार
• इसके बाद ग्रेडिंग और पैकिंग
तालाब के अलावा कहां संभव है खेती
छत्तीसगढ़ में मखाना खेती के लिए कई वैकल्पिक क्षेत्र मौजूद हैं—
• धान के वे खेत जहां लंबे समय तक पानी ठहरता है
• सिंचाई जलाशयों के उथले हिस्से
• ग्रामीण क्षेत्रों के खाली तालाब
• व्यक्तिगत फार्म पॉन्ड
धमतरी, महासमुंद, बालोद, कांकेर, राजनांदगांव, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा जैसे जिलों में इसकी विशेष संभावनाएं हैं।
मखाना की खेती में लागत (प्रति एकड़ अनुमान)
• बीज लागत: ₹8,000 – ₹10,000
• श्रम व रखरखाव: ₹12,000 – ₹18,000
• कटाई व प्रोसेसिंग: ₹8,000 – ₹10,000
• कुल खर्च: लगभग ₹30,000 – ₹40,000
आमदनी और मुनाफा
• कच्चा मखाना उत्पादन: 8–10 क्विंटल/एकड़
• प्रोसेसिंग के बाद: 2–2.5 क्विंटल पॉप्ड मखाना
• बाजार मूल्य: ₹900 – ₹1,300 प्रति किलो
• कुल आय: ₹2.0 – ₹3.25 लाख
• शुद्ध लाभ: ₹1.6 – ₹2.8 लाख प्रति एकड़
उत्पादन में लगने वाला समय
• फसल अवधि: 6–7 महीने
• एक बार रोपण के बाद 3–4 वर्षों तक उत्पादन संभव
मखाना के प्रमुख स्वास्थ्य और सामाजिक लाभ
• उच्च प्रोटीन और कैल्शियम युक्त
• डायबिटीज और हृदय रोगियों के लिए लाभकारी
• गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए पौष्टिक
• व्रत और उपवास में व्यापक उपयोग
• ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन
छत्तीसगढ़ में मखाना की खेती कम लागत, अधिक लाभ और जल संसाधनों के बेहतर उपयोग का एक प्रभावी मॉडल बन सकती है। यह धान आधारित खेती का विकल्प नहीं बल्कि आय बढ़ाने वाला पूरक साधन है। यदि कृषि विभाग द्वारा प्रशिक्षण, बीज उपलब्धता और विपणन सहयोग दिया जाए, तो मखाना आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ के किसानों की आर्थिक स्थिति बदल सकता है।

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