सूरजमुखी की खेती
सूरजमुखी (Sunflower) भारत की एक प्रमुख तिलहनी फसल है। इसकी खेती कम समय में अधिक लाभ देने वाली मानी जाती है। सूरजमुखी के बीजों से प्राप्त तेल स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी होता है, क्योंकि इसमें उच्च मात्रा में असंतृप्त वसा अम्ल (Unsaturated Fatty Acids) पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त सूरजमुखी का उपयोग खाद्य तेल, पशु आहार, सजावटी पौधे तथा औद्योगिक उपयोगों में भी किया जाता है।
1. सूरजमुखी का महत्व
यह अल्प अवधि (90–110 दिन) में तैयार होने वाली फसल है।
इसमें 40–45% तक तेल की मात्रा पाई जाती है।
तेल में कोलेस्ट्रॉल कम होता है, जिससे यह हृदय रोगियों के लिए उपयोगी है।
कम पानी में उगने वाली फसल होने के कारण सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त।
इसकी खेती खरीफ, रबी और जायद – तीनों मौसमों में की जा सकती है।
2. जलवायु एवं भूमि
जलवायु:
सूरजमुखी की खेती के लिए समशीतोष्ण से उष्ण जलवायु उपयुक्त होती है।
20–30°C तापमान सर्वोत्तम माना जाता है।
अधिक वर्षा या पाला फसल को नुकसान पहुँचा सकता है।
भूमि:
अच्छी जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम रहती है।
भूमि का pH मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए।
जलभराव वाली भूमि उपयुक्त नहीं होती।
3. उन्नत किस्में
भारत में सूरजमुखी की कई उन्नत किस्में उपलब्ध हैं, जैसे—
केबीएसएच-1, केबीएसएच-44
एमएसएफएच-8, एमएसएफएच-17
सूर्या, आधुनिक, मर्डन
पीएसएच-1962, डीआरएसएफ-113
4. बुवाई का समय एवं विधि
बुवाई का समय:
खरीफ: जून–जुलाई
रबी: अक्टूबर–नवंबर
जायद: जनवरी–फरवरी
बुवाई की विधि:
कतार से कतार दूरी: 45–60 सेमी
पौधे से पौधे की दूरी: 20–30 सेमी
बीज की गहराई: 4–5 सेमी
बीज दर:
6–8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
5. खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
गोबर की सड़ी खाद: 10–12 टन प्रति हेक्टेयर
नाइट्रोजन: 60–80 किग्रा
फॉस्फोरस: 40–50 किग्रा
पोटाश: 40 किग्रा प्रति हेक्टेयर
नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुवाई के समय और शेष फूल आने की अवस्था में देना लाभकारी होता है।
6. सिंचाई प्रबंधन
सूरजमुखी को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती।
पहली सिंचाई बुवाई के 20–25 दिन बाद।
दूसरी सिंचाई कली बनने के समय।
तीसरी सिंचाई दाना भरने की अवस्था में।
जलभराव से बचाव आवश्यक।
7. खरपतवार नियंत्रण
पहली निराई-गुड़ाई बुवाई के 20–25 दिन बाद।
दूसरी निराई 40–45 दिन बाद।
रासायनिक नियंत्रण हेतु पेंडीमेथालिन का प्रयोग किया जा सकता है।
8. रोग एवं कीट प्रबंधन
प्रमुख कीट:
पत्ती खाने वाली इल्ली
तना छेदक
माहू (एफिड)
प्रमुख रोग:
अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग
जड़ सड़न
डाउनी मिल्ड्यू
नियंत्रण उपाय:
रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन।
बीज उपचार करना।
आवश्यकता अनुसार कीटनाशक एवं फफूंदनाशक का प्रयोग।
9. कटाई एवं उपज
फसल 90–110 दिनों में तैयार हो जाती है।
जब फूल की पंखुड़ियाँ सूखने लगें और बीज कठोर हो जाएँ तब कटाई करें।
औसत उपज: 15–20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (उन्नत तकनीक से अधिक भी संभव)।
10. आर्थिक लाभ
सूरजमुखी की खेती कम लागत में अधिक लाभ देती है।
तेल उद्योग में इसकी निरंतर माँग बनी रहती है।
किसान इसे अन्य फसलों के साथ फसल चक्र में शामिल कर अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं।
सूरजमुखी की खेती किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प है। सही किस्म, संतुलित खाद-उर्वरक, समय पर सिंचाई और रोग-कीट प्रबंधन अपनाकर किसान अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। तिलहन उत्पादन बढ़ाने में सूरजमुखी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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