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सरसों की खेती

 

सरसों की खेती 

सरसों छत्तीसगढ़ की रबी मौसम की एक महत्वपूर्ण तिलहनी फसल है, जो कम लागत में अच्छी आय देने की क्षमता रखती है। राज्य में धान कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों में सरसों की खेती किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का सशक्त साधन बन रही है। सरसों के बीजों से प्राप्त तेल घरेलू उपयोग के साथ‑साथ बाजार में भी अच्छी कीमत दिलाता है। इसके अतिरिक्त सरसों की खली पशुओं के पोषण के लिए उपयोगी होती है।

छत्तीसगढ़ में सरसों की खेती मुख्य रूप से रायपुर, धमतरी, महासमुंद, बलौदाबाजार, दुर्ग, राजनांदगांव, बेमेतरा, बिलासपुर, जांजगीर‑चांपा, कोरबा तथा सरगुजा संभाग के कुछ जिलों में की जाती है।

2. छत्तीसगढ़ में सरसों की खेती का महत्व

धान के बाद रबी में उपयुक्त वैकल्पिक फसल

कम पानी और कम लागत में खेती संभव

अल्प अवधि (110–130 दिन) की फसल

मधुमक्खी पालन को बढ़ावा

राज्य में खाद्य तेल आत्मनिर्भरता की दिशा में सहायक

छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए लाभकारी


3. जलवायु एवं मिट्टी (छत्तीसगढ़ के संदर्भ में)

जलवायु

छत्तीसगढ़ की उपोष्णकटिबंधीय जलवायु सरसों के लिए अनुकूल है। रबी मौसम में 18–25°C तापमान उपयुक्त रहता है। फूल आने की अवस्था में अधिक वर्षा या पाला फसल को नुकसान पहुँचा सकता है।

मिट्टी

राज्य में पाई जाने वाली दोमट, बलुई दोमट एवं हल्की मटियार मिट्टी सरसों के लिए उपयुक्त है।

pH मान: 6.0–7.5

जल निकास की अच्छी व्यवस्था आवश्यक

भारी एवं जलभराव वाली मिट्टी अनुपयुक्त


4. छत्तीसगढ़ के लिए अनुशंसित उन्नत किस्में

वरुणा

पूसा बोल्ड

पूसा जयकिसान

आरएच‑30

गिरिराज

जवाहर सरसों‑1

आरएन‑393


ये किस्में राज्य की जलवायु में अच्छी उपज देने वाली एवं रोग प्रतिरोधी मानी जाती हैं।

5. खेत की तैयारी

धान कटाई के बाद खेत की गहरी जुताई करें

2–3 बार देशी हल या कल्टीवेटर चलाएँ

पाटा लगाकर खेत समतल करें

अंतिम जुताई में सड़ी गोबर खाद मिलाएँ

अच्छी तरह तैयार भुरभुरी मिट्टी अंकुरण के लिए आवश्यक है।

6. बुवाई का समय एवं विधि (छत्तीसगढ़)

बुवाई का उपयुक्त समय

अक्टूबर के प्रथम पखवाड़े से नवंबर के प्रथम सप्ताह तक

देर से बुवाई करने पर उपज घटती है


बुवाई की विधि

कतार में बुवाई सर्वोत्तम

कतार दूरी: 30–45 सेमी

पौधे की दूरी: 10–15 सेमी

बीज की मात्रा: 4–5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर


7. बीज उपचार

थायरम या कार्बेन्डाजिम @ 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज

दीमक से बचाव हेतु क्लोरोपायरीफॉस से उपचार

बीज उपचार से प्रारंभिक रोगों से सुरक्षा मिलती है।

8. खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

छत्तीसगढ़ की मिट्टी में सल्फर की कमी पाई जाती है, अतः इसका प्रयोग आवश्यक है।

गोबर की सड़ी खाद: 10–12 टन/हे.

नाइट्रोजन: 60–80 किग्रा/हे.

फास्फोरस: 40 किग्रा/हे.

पोटाश: 20 किग्रा/हे.

सल्फर: 20–25 किग्रा/हे.


पूरी मात्रा बुवाई के समय खेत में मिलाएँ।

9. सिंचाई प्रबंधन

छत्तीसगढ़ में सामान्यतः 2 सिंचाई पर्याप्त होती हैं:

पहली सिंचाई: 30–35 दिन बाद

दूसरी सिंचाई: फूल आने पर

आवश्यकता होने पर दाना भरते समय हल्की सिंचाई

जलभराव से बचाव अनिवार्य है।

10. खरपतवार नियंत्रण

पहली निराई‑गुड़ाई: 20–25 दिन बाद

दूसरी निराई (आवश्यकतानुसार): 40 दिन बाद

रासायनिक नियंत्रण हेतु अनुशंसित खरपतवारनाशकों का सीमित प्रयोग


11. कीट एवं रोग प्रबंधन

प्रमुख कीट (छत्तीसगढ़ में सामान्य)

माहू (एफिड) – सबसे हानिकारक

आरा मक्खी

बालदार इल्ली


प्रमुख रोग

सफेद गेरूआ

अल्टरनेरिया झुलसा

चूर्णी फफूंदी


समय पर कीटनाशक एवं फफूंदनाशक का प्रयोग कर नियंत्रण करें।

12. कटाई एवं उपज

जब 70–80% फलियाँ पीली हो जाएँ तब कटाई करें।

औसत उपज: 12–15 क्विंटल/हे.

उन्नत तकनीक अपनाने पर: 18–20 क्विंटल/हे.


13. भंडारण

बीजों को अच्छी तरह सुखाएँ

नमी 8% से कम रखें

हवादार, सूखे एवं साफ गोदाम में भंडारण करें

छत्तीसगढ़ में सरसों की खेती धान के बाद रबी मौसम में किसानों के लिए आय बढ़ाने का प्रभावी साधन है। यदि किसान समय पर बुवाई, उन्नत किस्मों का चयन, संतुलित खाद, सिंचाई तथा कीट‑रोग प्रबंधन अपनाएँ, तो सरसों की खेती से बेहतर उत्पादन और मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है। राज्य में तिलहन उत्पादन बढ़ाने की दृष्टि से सरसों की खेती का विशेष महत्व है।

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