अमरीश पुरी: खलनायक की परिभाषा से परे एक महान अभिनेता
लेखक -जयप्रकाश सिन्हा
हिंदी सिनेमा के इतिहास में यदि किसी अभिनेता ने अपने दमदार अभिनय, गूंजती आवाज़ और सशक्त व्यक्तित्व से दर्शकों के मन में अमिट छाप छोड़ी है, तो वह नाम है अमरीश पुरी। वे केवल एक खलनायक नहीं थे, बल्कि भारतीय सिनेमा के ऐसे स्तंभ थे, जिन्होंने नकारात्मक किरदारों को गरिमा, गहराई और यादगार पहचान दी। उनकी मौजूदगी मात्र से पर्दे पर तनाव, भय और प्रभाव पैदा हो जाता था। अमरीश पुरी ने लगभग चार दशकों तक सिनेमा पर राज किया और यह सिद्ध किया कि एक अभिनेता का कद उसके किरदार की अच्छाई-बुराई से नहीं, बल्कि उसके अभिनय की सच्चाई से तय होता है।
प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
अमरीश पुरी का जन्म 22 जून 1932 को तत्कालीन पंजाब प्रांत के नवांशहर (अब शहीद भगत सिंह नगर, पंजाब) में हुआ। उनका पूरा नाम अमरीश लाल पुरी था। उनका परिवार शिक्षित और अनुशासित था। उनके पिता ब्रिटिश शासन में अधिकारी थे। अमरीश पुरी के बड़े भाई मदन पुरी और चमन पुरी पहले ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित अभिनेता थे।
हालांकि, फिल्मी परिवार से होने के बावजूद अमरीश पुरी का सफर आसान नहीं रहा। युवावस्था में उन्होंने रेडियो और फिल्मों में काम पाने की कोशिश की, लेकिन उनकी भारी आवाज़ और कठोर चेहरे के कारण उन्हें कई बार अस्वीकार कर दिया गया। असफलताओं से निराश होकर उन्होंने भारतीय श्रम मंत्रालय में नौकरी कर ली और वहीं रहते हुए अपने अभिनय के सपने को जीवित रखा।
थिएटर से सिनेमा तक का सफर
अमरीश पुरी के जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब वे प्रसिद्ध रंगमंच निर्देशक सत्यदेव दुबे और थिएटर ग्रुप से जुड़े। उन्होंने पृथ्वी थिएटर और अन्य मंचों पर गंभीर नाटकों में अभिनय किया। थिएटर ने उनके अभिनय को धार दी, संवाद अदायगी को मजबूत बनाया और भावनात्मक गहराई दी।
यहीं से उन्हें समानांतर सिनेमा के महान निर्देशक श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी की नजर में आने का अवसर मिला। वर्ष 1971 में फिल्म रेशमा और शेरा से उन्होंने सिनेमा में कदम रखा, लेकिन पहचान उन्हें 1970 के दशक के उत्तरार्ध में मिली।
खलनायक के रूप में उदय
अमरीश पुरी का वास्तविक उदय 1980 के दशक में हुआ। उस दौर में हिंदी सिनेमा में खलनायकों की भूमिका सीमित और एकरूप होती थी, लेकिन अमरीश पुरी ने इन किरदारों को नई परिभाषा दी।
फिल्म हम पाँच (1980) में उनका किरदार दर्शकों को डराने में सफल रहा। इसके बाद विदेशी, कर्ज़, नगीना, विधाता, मिस्टर इंडिया, घायल, दामिनी, कोयला जैसी फिल्मों में उन्होंने ऐसे खलनायक निभाए जो केवल बुरे नहीं, बल्कि बेहद प्रभावशाली और शक्तिशाली थे।
मोगैम्बो: एक अमर किरदार
1987 में आई फिल्म मिस्टर इंडिया का किरदार मोगैम्बो भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित विलेन में से एक है। “मोगैम्बो खुश हुआ” आज भी भारतीय पॉप कल्चर का हिस्सा है। यह किरदार केवल संवादों के कारण नहीं, बल्कि अमरीश पुरी की देहभाषा, हंसी और ठंडी क्रूरता के कारण अमर हुआ।
नकारात्मक भूमिकाओं में विविधता
अमरीश पुरी की खासियत यह थी कि वे हर फिल्म में एक जैसे खलनायक नहीं लगते थे। कहीं वे सामंती ज़मींदार बने, कहीं अंतरराष्ट्रीय अपराधी, कहीं तानाशाह पिता तो कहीं राजनीतिक षड्यंत्रकारी।
फिल्म दामिनी में उन्होंने एक प्रभावशाली और कानून से ऊपर समझने वाले व्यक्ति की भूमिका निभाई, जो समाज की सच्चाई को दर्शाती है। वहीं घायल में उनका किरदार सत्ता और अपराध के गठजोड़ का प्रतीक था।
चरित्र भूमिकाओं में नई पहचान
1990 के दशक में अमरीश पुरी ने अपनी छवि को तोड़ते हुए सकारात्मक और चरित्र भूमिकाएं भी निभाईं।
फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे में वे सख्त लेकिन संस्कारी पिता चौधरी बलदेव सिंह बने, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा। यह किरदार बताता है कि वे केवल खलनायक नहीं, बल्कि संवेदनशील अभिनेता भी थे।
फिल्में जैसे:
परदेस
विरासत
चाइना गेट
घातक
इनमें उन्होंने गंभीर, प्रभावशाली और नैतिक द्वंद्व से जूझते किरदार निभाए।
अंतरराष्ट्रीय पहचान
अमरीश पुरी उन चुनिंदा भारतीय अभिनेताओं में से थे जिन्होंने हॉलीवुड में भी काम किया।
1984 में स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म Indiana Jones and the Temple of Doom में उन्होंने खलनायक मोला राम की भूमिका निभाई। यह भूमिका उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली साबित हुई।
इसके अलावा उन्होंने कई अंग्रेज़ी और विदेशी फिल्मों में भी अभिनय किया, जिससे भारतीय कलाकारों की वैश्विक छवि मजबूत हुई।
सम्मान और पुरस्कार
अमरीश पुरी को उनके योगदान के लिए अनेक पुरस्कार मिले:
फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार – 3 बार
फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार
पद्मश्री (2005, मरणोपरांत)
ये पुरस्कार इस बात के प्रमाण हैं कि उनका अभिनय केवल लोकप्रिय ही नहीं, बल्कि कलात्मक भी था।
व्यक्तिगत जीवन और व्यक्तित्व
पर्दे पर डरावने दिखने वाले अमरीश पुरी वास्तविक जीवन में बेहद सादगीपूर्ण, अनुशासित और पढ़ने-लिखने वाले व्यक्ति थे। वे साहित्य, संगीत और दर्शन में रुचि रखते थे। उन्होंने कभी अपनी लोकप्रियता का दिखावा नहीं किया और हमेशा अभिनय को साधना की तरह लिया।
अंतिम समय और विरासत
अमरीश पुरी का निधन 12 जनवरी 2005 को हुआ। उनके जाने से हिंदी सिनेमा ने एक ऐसे अभिनेता को खो दिया, जिसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी। उनके संवाद, किरदार और अभिनय आज भी नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए प्रेरणा हैं।
निष्कर्ष
अमरीश पुरी केवल खलनायक नहीं थे, वे भारतीय सिनेमा की आत्मा थे। उन्होंने यह साबित किया कि नकारात्मक भूमिका भी समाज का आईना हो सकती है और सशक्त अभिनय के जरिए अमर बन सकती है। उनका नाम हमेशा हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम अध्याय में दर्ज रहेगा।
अमरीश पुरी—एक अभिनेता, एक संस्थान, एक युग।


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