हिंदी सिनेमा का अमर खलनायक: फिल्म अभिनेता प्राण
(जब खलनायकी भी बन गई अभिनय की परा
काष्ठा)
लेखक - जयप्रकाश सिन्हा
हिंदी सिनेमा के इतिहास में यदि किसी अभिनेता ने खलनायक की परिभाषा को न सिर्फ गढ़ा बल्कि उसे गरिमा, शालीनता और बौद्धिक गहराई प्रदान की, तो वह नाम है— प्राण। उनका पूरा नाम प्राण कृष्ण सिकंद था, लेकिन सिनेमा की दुनिया में वे सिर्फ “प्राण” कहलाए और यह एक ऐसा नाम बन गया, जिससे खलनायक शब्द अपने आप जुड़ गया। लगभग पाँच दशकों तक हिंदी फिल्म उद्योग पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले प्राण न केवल खलनायक थे, बल्कि वे चरित्र अभिनेता, सहायक अभिनेता और अंततः मानवीय संवेदनाओं के प्रतिनिधि भी बने।
प्रारंभिक जीवन: पेशावर से बॉम्बे तक का सफर
प्राण का जन्म 12 फरवरी 1920 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के पेशावर (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उनके पिता सरकारी इंजीनियर थे, इसलिए उनका बचपन विभिन्न शहरों में बीता। शिक्षा उन्होंने देहरादून और रामपुर से प्राप्त की। युवावस्था में प्राण का झुकाव फोटोग्राफी की ओर था और वे एक प्रोफेशनल फोटोग्राफर बनना चाहते थे।
कहते हैं किस्मत कभी-कभी अचानक दरवाजा खटखटाती है। लाहौर में एक स्टूडियो के पास उनकी मुलाकात लेखक-निर्माता वल्लभाई पटेल से हुई, जिन्होंने उन्हें फिल्म यमला जट (1945) में अभिनय का मौका दिया। यहीं से प्राण के अभिनय जीवन की नींव पड़ी।
खलनायक के रूप में उभार
1940 और 1950 के दशक में हिंदी फिल्मों में खलनायक अक्सर एकरेखीय और अतिनाटकीय हुआ करते थे, लेकिन प्राण ने इस छवि को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने अपने खलनायकी किरदारों में बुद्धिमत्ता, शालीनता और मनोवैज्ञानिक गहराई जोड़ी।
फिल्म जिद्दी (1948), मधुमती, देवदास, नया दौर, दिल दिया दर्द लिया और राम और श्याम जैसी फिल्मों में उनके किरदार दर्शकों के मन में स्थायी रूप से बस गए। उनका संवाद अदायगी का अंदाज़, खासकर शब्दों को धीरे-धीरे ज़हर की तरह परोसना, उनकी पहचान बन गया।
“प्राण जैसा खलनायक” – एक मुहावरा
1950–60 के दशक में स्थिति यह हो गई कि माता-पिता अपने बच्चों को डराने के लिए कहते थे—
“चुप हो जाओ, नहीं तो प्राण आ जाएगा।”
यह मज़ाक नहीं, बल्कि उनके अभिनय की ताकत का प्रमाण था। प्राण इतने प्रभावी खलनायक बन चुके थे कि दर्शक उन्हें वास्तविक जीवन में भी नकारात्मक दृष्टि से देखने लगे। कई बार उन्हें सार्वजनिक कार्यक्रमों में विरोध और दूरी का सामना करना पड़ा, लेकिन यही उनके अभिनय की सबसे बड़ी जीत थी।
देव आनंद और दिलीप कुमार के साथ यादगार भूमिकाएँ
प्राण का नाम जब भी लिया जाता है, तो उनके सहयोग की चर्चा अनिवार्य हो जाती है। देव आनंद और दिलीप कुमार के साथ उनकी जोड़ी ऐतिहासिक रही।
देव आनंद के साथ फिल्मों में प्राण अक्सर चालाक और शातिर खलनायक बने, जबकि
दिलीप कुमार के साथ उनके किरदार अधिक गहरे और भावनात्मक दिखाई दिए।
फिल्म देवदास में चंद्रमुखी के संरक्षक की भूमिका हो या मधुमती में खलनायकी—प्राण ने हर बार अभिनय को नए स्तर पर पहुंचाया।
खलनायक से चरित्र अभिनेता बनने की यात्रा
1960 के दशक के अंत तक प्राण खलनायक की छवि से स्वयं भी बाहर निकलना चाहते थे। उम्र और समय की मांग को समझते हुए उन्होंने अपने करियर की दिशा बदली।
फिल्म उपकार (1967) में उनका मलंग चाचा का किरदार हिंदी सिनेमा के सबसे मानवीय और यादगार चरित्रों में से एक बन गया। यह वही फिल्म थी, जिसमें उन्होंने पहली बार सकारात्मक भूमिका निभाई और दर्शकों ने उन्हें उसी प्रेम से स्वीकार किया, जितना डर पहले महसूस करते थे।
इसके बाद ज़ंजीर, डॉन, अमर अकबर एंथनी, विक्टोरिया नंबर 203 और कसमें वादे जैसी फिल्मों में उन्होंने सहायक और चरित्र भूमिकाओं में भी अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया।
अमिताभ बच्चन के साथ नया दौर
1970 के दशक में जब अमिताभ बच्चन “एंग्री यंग मैन” के रूप में उभरे, तब प्राण उनके लिए एक मार्गदर्शक जैसे साबित हुए। फिल्म ज़ंजीर में शेर ख़ान का किरदार न केवल प्राण के करियर का टर्निंग पॉइंट था, बल्कि अमिताभ के लिए भी।
शेर ख़ान के रूप में प्राण ने दिखाया कि ताकत, सम्मान और दोस्ती कैसे परदे पर जीवंत की जाती है। यह भूमिका आज भी हिंदी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ सहायक भूमिकाओं में गिनी जाती है।
अभिनय की विशेषताएँ
प्राण की सबसे बड़ी खासियत थी—
संयमित अभिनय
संवादों की स्पष्ट और सधी हुई अदायगी
आँखों से अभिनय करने की कला
वे कभी ज़रूरत से ज़्यादा शोर नहीं मचाते थे। उनकी खामोशी भी संवाद बोलती थी। यही कारण है कि वे भीड़ में भी अलग दिखाई देते थे।
निजी जीवन: सादगी और अनुशासन
परदे पर भले ही वे खलनायक रहे हों, लेकिन निजी जीवन में प्राण बेहद सादगीप्रिय और अनुशासित व्यक्ति थे। वे अपने परिवार के प्रति समर्पित थे और फिल्म उद्योग की चकाचौंध से दूरी बनाकर रखते थे।
उनकी पत्नी शुक्ला सिकंद और उनके बच्चे उनके जीवन की प्राथमिकता रहे। प्राण ने कभी भी विवादों को अपने आसपास नहीं फटकने दिया।
सम्मान और पुरस्कार
प्राण को उनके अभिनय के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया—
फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड
दादा साहब फाल्के पुरस्कार (2013) – भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान
यह पुरस्कार उनके पूरे जीवन और सिनेमा में योगदान की आधिकारिक मुहर था।
अंतिम समय और विरासत
प्राण का निधन 12 जुलाई 2013 को 93 वर्ष की आयु में हुआ। उनके जाने से हिंदी सिनेमा के एक युग का अंत हो गया। लेकिन वे आज भी अपनी फिल्मों, संवादों और किरदारों के माध्यम से जीवित हैं।
आज जब खलनायक की परिभाषा बदल चुकी है, तब भी प्राण का नाम एक मानक की तरह लिया जाता है—
“खलनायक हो तो प्राण जैसा।”
निष्कर्ष: अभिनय का अमर अध्याय
प्राण सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, वे संस्था थे। उन्होंने खलनायकी को नकारात्मकता से निकालकर कला के शिखर पर पहुँचाया। उनकी यात्रा इस बात का प्रमाण है कि सिनेमा में सिर्फ नायक नहीं, बल्कि सशक्त खलनायक भी इतिहास रचते हैं।



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