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लैब मे केसर की खेती

 लैब - नियंत्रित वातावरण में केसर की खेती





अब लैब में भी संभव ‘लाल सोने’ (केसर)का उत्पादन

✍️ विशेष रिपोर्ट | जयप्रकाश सिन्हा

अब तक केसर (Saffron) की खेती को केवल जम्मू-कश्मीर की ठंडी जलवायु तक सीमित माना जाता था, लेकिन नियंत्रित वातावरण (Controlled Environment Agriculture – CEA) और लैब आधारित तकनीक ने इस सोच को बदल दिया है। आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से अब केसर की खेती लैब, पॉलीहाउस, ग्रीनहाउस और क्लाइमेट कंट्रोल्ड रूम में भी संभव हो गई है।


केसर: दुनिया का सबसे महंगा मसाला

केसर को “लाल सोना” कहा जाता है। इसकी कीमत बाजार में ₹2.5 लाख से ₹5 लाख प्रति किलो तक होती है। इसका उपयोग दवा, सौंदर्य प्रसाधन, खाद्य पदार्थ और आयुर्वेदिक उपचारों में बड़े पैमाने पर होता है।

                   

        ऐसे करे लैब में केसर की खेती 


यह ऐसी तकनीक है जिसमें मिट्टी के बिना, नियंत्रित तापमान, नमी और रोशनी में केसर के कंद (Corms) उगाए जाते हैं। इसे Hydroponic / Aeroponic Saffron Farming भी कहा जाता है।


1️⃣ स्थान व लैब की तैयारी

लैब किसी कमरे, शेड या कंटेनर में बनाई जा सकती है।

आवश्यक परिस्थितियाँ

तापमान: 15°C – 20°C

आर्द्रता (Humidity): 60–70%

रोशनी: कम रोशनी / LED Light

वेंटिलेशन: उचित हवा का प्रवाह

कीट-रोग मुक्त वातावरण

👉 100–150 वर्गफुट में भी शुरुआत संभव।


2️⃣ केसर के कंद (Corms) का चयन





उच्च गुणवत्ता वाले Crocus sativus कंद लें

कंद का वजन: 8–12 ग्राम या अधिक

रोगमुक्त व ताजा कंद जरूरी

👉 बेहतर कंद = अधिक फूल = अधिक केसर


3️⃣ कंदों की प्रोसेसिंग (Pre-Treatment)

कंदों को फफूंदनाशक (Trichoderma / Carbendazim) से उपचारित करें

2–3 दिन सूखे व हवादार स्थान में रखें इससे रोग का खतरा कम होता है


4️⃣ ट्रे / रैक सिस्टम में कंद लगाना



प्लास्टिक ट्रे या मल्टी-लेवल रैक का प्रयोग

कंदों को एक-दूसरे से दूरी पर रखें नीचे पानी नहीं भरना है (Direct पानी से बचाव)

👉 मिट्टी की जरूरत नहीं होती


5️⃣ फूल निकलने की प्रक्रिया (Flowering Stage)

20–25 दिन में फूल निकलने लगते हैं,फूल बैंगनी रंग के होते हैं इसी चरण में केसर निकलता है


6️⃣ केसर की तुड़ाई (Harvesting)

फूल सुबह-सुबह तोड़ें प्रत्येक फूल में 3 लाल धागे (Stigma) होते हैं ।धागों को सावधानी से अलग करें

👉 150 फूल ≈ 1 ग्राम सूखा केसर


7️⃣ सुखाने की प्रक्रिया (Drying)

धागों को 40–45°C पर सुखाएं, ड्रायर या छाया में सुखाना बेहतर नमी पूरी तरह निकल जाए

👉 सुखाने से रंग, सुगंध और गुणवत्ता बढ़ती है


8️⃣ पैकिंग और भंडारण

• एयर-टाइट कांच या फूड-ग्रेड डिब्बेठंडी, सूखी जगह में रखें सीधे धूप से बचाएं


 उत्पादन अवधि

• पूरी प्रक्रिया: 30–40 दिन

• साल में 2–3 चक्र संभव


लागत और मुनाफा (अनुमान)

• विवरणअनुमानप्रारंभिक लागत₹1–3 लाख1 किलो केसर की कीमत₹2.5–5 लाखकम जगह, अधिक लाभ।


 लैब मे नियंत्रित वातावरण में केसर की खेती

नियंत्रित वातावरण में खेती का अर्थ है—

जहाँ तापमान, नमी, रोशनी और वेंटिलेशन को वैज्ञानिक रूप से नियंत्रित किया जाता है। इसमें मिट्टी की बजाय हाइड्रोपोनिक ट्रे, एयर शेल्फ या न्यूट्रिएंट मीडिया का प्रयोग भी किया जाता है।

 लैब या इंडोर केसर खेती की प्रक्रिया


1️⃣ कंद (Corm) का चयन:- 

• उच्च गुणवत्ता वाले केसर कंद (8–12 ग्राम)

• रोग-मुक्त और प्रमाणित स्रोत से


2️⃣ तापमान व नमी नियंत्रण:-

• तापमान: 15°C – 20°C

• आर्द्रता: 65% – 75%

3️⃣ रोशनी व्यवस्था :-

• एलईडी ग्रो लाइट (8–10 घंटे प्रतिदिन)

• प्राकृतिक प्रकाश आवश्यक नहीं


4️⃣ बिना मिट्टी की खेती

• ट्रे या रैक सिस्टम

• पोषक तत्व युक्त माध्यम


5️⃣ फूल निकलने की अवधि:- 

• 25–30 दिन में फूल

• 1 फूल से 3 लाल धागे (केसर)


 


 लैब खेती के फायदे

 केसर की लैब खेती के प्रमुख फायदे 


✅ 1. मौसम पर निर्भरता नहीं

पारंपरिक केसर खेती केवल ठंडे और विशेष जलवायु क्षेत्रों (जैसे कश्मीर) में ही संभव है। लेकिन लैब या नियंत्रित वातावरण में—

तापमान (15–20°C), नमी और रोशनी को मशीनों द्वारा नियंत्रित किया जाता है

बारिश, पाला, गर्मी या सूखे का कोई प्रभाव नहीं पड़ता

देश के किसी भी हिस्से में खेती संभव होती है

➡️ इससे किसान जलवायु जोखिम से मुक्त हो जाता है।


✅ 2. कम जगह में अधिक उत्पादन लैब खेती में—

रैक सिस्टम और ट्रे तकनीक का उपयोग होता है

एक छोटे कमरे में कई लेयर में केसर उगाया जा सकता है

1–2 कमरों में उतना उत्पादन संभव है जितना पारंपरिक खेती में 1 एकड़ से होता है

➡️ यह शहरी किसानों, स्टार्टअप और छोटे निवेशकों के लिए बेहद लाभकारी मॉडल है।


✅ 3. रोग व कीट नियंत्रण आसान

खुले खेतों में केसर की फसल को—

फंगल रोग कीट और मिट्टी जनित बीमारियाँका खतरा रहता है।


लेकिन लैब खेती में—

मिट्टी का प्रयोग नहीं या बहुत सीमित होता है बाहरी कीट प्रवेश नहीं कर पाते सायनों की आवश्यकता लगभग समाप्त हो जाती है

➡️ इससे जैविक व सुरक्षित केसर का उत्पादन संभव होता है।


✅ 4. उच्च गुणवत्ता व शुद्धता

लैब में उगाया गया केसर—

रंग (Crocin), खुशबू (Safranal) और स्वाद (Picrocrocin) में अधिक समृद्ध होता है

मिलावट की संभावना शून्य होती है

अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों (ISO) पर खरा उतरता है

➡️ यही कारण है कि लैब में उत्पादित केसर को बेहतर बाजार मूल्य मिलता है।


✅ 5. वर्षभर उत्पादन संभव


पारंपरिक खेती में केसर—

साल में केवल एक बार ही उगाया जा सकता है

लेकिन लैब खेती में—

• तापमान और रोशनी को नियंत्रित कर साल में 3–4 बार फसल ली जा सकती ह|उत्पादन की निरंतरता बनी रहती है |इससे किसान की आय स्थायी और नियमित होती है।


 अतिरिक्त लाभ जो लैब केसर खेती को खास बनाते हैं

✔️ कम पानी की आवश्यकता

✔️ श्रम लागत में कमी

✔️ युवाओं के लिए स्टार्टअप अवसर

✔️ निर्यात की उच्च संभावनाएं

✔️ किसान की आय में कई गुना वृद्धि

कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि लैब आधारित केसर खेती भारत को आयात पर निर्भरता से मुक्त कर सकती है और युवाओं के लिए यह एक उच्च आय वाला स्टार्टअप मॉडल बन सकता है।



लैब या नियंत्रित वातावरण में केसर की खेती भारत के कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला रही है। यह तकनीक न केवल किसानों की आय बढ़ा रही है बल्कि शहरी खेती और स्टार्टअप संस्कृति को भी नया आयाम दे रही है।

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