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पृथ्वीराज कपूर: भारतीय सिनेमा और रंगमंच का स्तंभ

 

पृथ्वीराज कपूर: भारतीय सिनेमा और रंगमंच का  स्तंभ

 लेखक -जयप्रकाश सिन्हा



भारतीय सिनेमा और रंगमंच के इतिहास में यदि किसी एक नाम को नींव का पत्थर कहा जाए, तो वह नाम है — पृथ्वीराज कपूर। वे केवल एक महान अभिनेता ही नहीं थे, बल्कि एक ऐसे सांस्कृतिक योद्धा थे, जिन्होंने अभिनय को सम्मान, गरिमा और सामाजिक चेतना से जोड़ा। आज कपूर परिवार जिस ऊँचाई पर खड़ा दिखाई देता है, उसकी जड़ें पृथ्वीराज कपूर की तपस्या, संघर्ष और दूरदृष्टि में छिपी हैं।

प्रारंभिक जीवन: पेशावर से बंबई तक का सफर

पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर 1906 को ब्रिटिश भारत के पेशावर (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उनका परिवार शिक्षित और संस्कारवान था। उनके पिता बसंत कपूर एक पुलिस अधिकारी थे। पृथ्वीराज कपूर ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पेशावर और लाहौर में प्राप्त की। बाद में वे कानून की पढ़ाई के लिए लाहौर के एडवर्ड्स कॉलेज में दाख़िल हुए, लेकिन अभिनय के प्रति उनका झुकाव उन्हें पढ़ाई से दूर और रंगमंच के करीब ले आया।

उस दौर में अभिनय को सम्मानजनक पेशा नहीं माना जाता था, लेकिन पृथ्वीराज कपूर ने समाज की परवाह किए बिना अपने सपनों का पीछा किया। महज 18 वर्ष की उम्र में, वे जेब में कुछ रुपये लेकर बंबई (मुंबई) पहुँचे—एक ऐसे शहर में, जहाँ न कोई पहचान थी, न कोई सहारा।

सिनेमा में प्रवेश और शुरुआती संघर्ष

पृथ्वीराज कपूर ने अपने करियर की शुरुआत मूक फिल्मों से की। उनकी पहली फिल्म मानी जाती है “बे-दिल” (1928)। उस समय फिल्में बोलती नहीं थीं, लेकिन पृथ्वीराज कपूर की आँखों की भाषा, शारीरिक अभिनय और मंचीय प्रशिक्षण ने उन्हें अलग पहचान दी।

जब 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म “आलम आरा” आई, तब पृथ्वीराज कपूर उन कलाकारों में थे जिन्होंने नए सिनेमा को आत्मसात किया। उनकी बुलंद आवाज़, शुद्ध हिंदी-उर्दू उच्चारण और राजसी व्यक्तित्व ने उन्हें ऐतिहासिक और गंभीर भूमिकाओं के लिए आदर्श बना दिया।

ऐतिहासिक और पौराणिक किरदारों के सम्राट

1930 और 1940 के दशक में पृथ्वीराज कपूर ने कई ऐसी भूमिकाएँ निभाईं, जिन्होंने उन्हें अमर बना दिया।
उनकी प्रमुख फिल्मों में शामिल हैं:

• सिकंदर (1941) – सिकंदर महान के किरदार में उनका अभिनय आज भी बेमिसाल माना जाता है

• मुग़ल-ए-आज़म (1960) – अकबर के रूप में उनका अभिनय भारतीय सिनेमा का स्वर्ण अध्याय है

• आवारा (1951) – पिता की भूमिका में गहन भावनात्मक प्रस्तुति

• दहेज (1950) – सामाजिक विषयों पर गंभीर अभिनय


विशेष रूप से मुग़ल-ए-आज़म में सम्राट अकबर के रूप में उनका अभिनय इतना प्रभावशाली था कि दिलीप कुमार जैसे महान अभिनेता भी उनके सामने स्वयं को छोटा मानते थे।

पृथ्वी थिएटर: रंगमंच को जीवन समर्पित

जहाँ अधिकांश अभिनेता फिल्मों तक सीमित रहते हैं, वहीं पृथ्वीराज कपूर ने रंगमंच को अपना मिशन बना लिया।
1944 में उन्होंने “पृथ्वी थिएटर” की स्थापना की, जिसका उद्देश्य था — पूरे देश में नाटक के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना फैलाना।
पृथ्वी थिएटर की खास बातें:

• देशभर में घूम-घूमकर नाटक करना

• आम जनता तक थिएटर पहुँचाना

• सामाजिक विषयों पर नाटक

• युवा कलाकारों को मंच देना


 उनके प्रसिद्ध नाटकों में शामिल हैं:

• दीवार

• पठान

• आहूति


लगभग 16 वर्षों तक, पृथ्वीराज कपूर ने बिना किसी स्थायी आय के थिएटर को जीवित रखा। वे इसे व्यवसाय नहीं, बल्कि सेवा मानते थे।

पारिवारिक विरासत: कपूर खानदान की नींव

पृथ्वीराज कपूर केवल स्वयं महान नहीं थे, बल्कि उन्होंने एक ऐसी विरासत छोड़ी, जिसने भारतीय सिनेमा को दशकों तक दिशा दी।

उनके पुत्र:

• राज कपूर – शोमैन ऑफ इंडियन सिनेमा

• शम्मी कपूर – रोमांटिक हीरो

• शशि कपूर – अंतरराष्ट्रीय पहचान वाले अभिनेता


उनकी आने वाली पीढ़ियों में:

• रणधीर कपूर

• ऋषि कपूर

• करीना कपूर

• करिश्मा कपूर

• रणबीर कपूर

पूरा कपूर परिवार आज भी पृथ्वीराज कपूर को अपनी प्रेरणा मानता है।

सामाजिक सोच और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण

पृथ्वीराज कपूर का अभिनय केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं था। वे नाटकों और फिल्मों के माध्यम से:

• सामाजिक कुरीतियों पर सवाल उठाते थे

• स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना फैलाते थे

• आम आदमी की पीड़ा को मंच देते थे


उनके नाटक “पठान” को आज़ादी की लड़ाई से जोड़ा जाता है। वे मानते थे कि कलाकार का दायित्व केवल अभिनय नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना भी है।

सम्मान और पुरस्कार

भारत सरकार ने पृथ्वीराज कपूर के योगदान को सम्मानित करते हुए:

• 1969 में पद्म भूषण

• 1971 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (मरणोपरांत)

ये सम्मान उनके पूरे जीवन के योगदान की औपचारिक स्वीकृति थे।

अंतिम समय और अमर विरासत

पृथ्वीराज कपूर का निधन 29 मई 1972 को हुआ। उनके जाने से एक युग का अंत हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है—फिल्मों में, थिएटर में और कपूर परिवार की हर पीढ़ी में।

उनकी स्मृति में:

• पृथ्वी थिएटर (जुहू, मुंबई) आज भी रंगमंच का केंद्र है

• पृथ्वी राज कपूर फेस्टिवल आयोजित किया जाता है


अभिनय को इबादत बनाने वाला कलाकार

पृथ्वीराज कपूर केवल अभिनेता नहीं थे, वे एक विचार थे। उन्होंने साबित किया कि अभिनय केवल पर्दे पर दिखना नहीं, बल्कि समाज से संवाद करना है। आज जब भारतीय सिनेमा वैश्विक मंच पर खड़ा है, तो उसकी नींव में पृथ्वीराज कपूर का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।

भारतीय रंगमंच और सिनेमा जब-जब अपने इतिहास को देखेगा, पृथ्वीराज कपूर एक दीपस्तंभ की तरह मार्गदर्शन करते रहेंगे।

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