शम्मी कपूर: भारतीय सिनेमा का सदाबहार ‘रिबेल रोमांटिक हीरो’
लेखक- जयप्रकाश सिन्हा
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने अभिनय के साथ-साथ अपने व्यक्तित्व, अंदाज़ और ऊर्जा से पूरी एक पीढ़ी की सोच को प्रभावित किया। शम्मी कपूर ऐसे ही एक अभिनेता थे, जिन्हें केवल पर्दे पर निभाए गए किरदारों से नहीं, बल्कि उनके अनोखे स्टाइल, बिंदास रोमांस और युवा उत्साह से जाना जाता है। वे सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि 50–60 के दशक के युवाओं की आवाज़ और सपनों के प्रतीक थे।
शम्मी कपूर ने उस दौर में हिंदी सिनेमा को एक नया तेवर दिया, जब नायक आमतौर पर गंभीर, संयमित और मर्यादित दिखाया जाता था। उन्होंने इस परंपरा को तोड़ते हुए उछलता-कूदता, गाता-नाचता और खुलकर प्यार जताने वाला हीरो गढ़ा। यही वजह है कि आज भी उन्हें “याहू स्टार” और “रिबेल रोमांटिक हीरो” के नाम से याद किया जाता है।
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
शम्मी कपूर का जन्म 21 अक्टूबर 1931 को मुंबई (तत्कालीन बंबई) में हुआ। उनका पूरा नाम शमशेर राज कपूर था। वे भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित परिवार कपूर खानदान से ताल्लुक रखते थे।
उनके पिता पृथ्वीराज कपूर थिएटर और फिल्मों के महान स्तंभ थे, जिन्होंने पृथ्वी थिएटर के माध्यम से भारतीय रंगमंच को नई पहचान दी। उनके बड़े भाई राज कपूर और छोटे भाई शशि कपूर भी हिंदी सिनेमा के दिग्गज कलाकार बने। ऐसे परिवार में जन्म लेने के बावजूद शम्मी कपूर के लिए अपनी अलग पहचान बनाना आसान नहीं था।
संघर्ष के दिन और अभिनय की शुरुआत
शम्मी कपूर ने अपने करियर की शुरुआत थिएटर से की। पृथ्वी थिएटर में काम करते हुए उन्होंने अभिनय की बारीकियाँ सीखीं। फिल्मों में उन्हें शुरुआत में सहायक भूमिकाएँ और छोटे रोल ही मिले।
उनकी पहली फिल्म “जीवन ज्योति” (1953) थी, लेकिन यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही। शुरुआती वर्षों में वे लगातार संघर्ष करते रहे और कई असफल फिल्मों का सामना करना पड़ा। उस दौर में वे अपने भाई राज कपूर की भारी सफलता की छाया में दबे हुए थे।
यह वही समय था जब शम्मी कपूर ने आत्ममंथन किया और अपने अभिनय की दिशा बदलने का निर्णय लिया।
स्टाइल में क्रांति: ‘याहू’ का जन्म
1950 के दशक के अंत में शम्मी कपूर ने अपने व्यक्तित्व को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने एल्विस प्रेस्ली से प्रेरित होकर बालों की नई स्टाइल, खुले कॉलर के कपड़े और ऊर्जावान बॉडी लैंग्वेज अपनाई।
फिल्म “तुमसा नहीं देखा” (1957) और विशेष रूप से “कश्मीर की कली” (1964) ने उन्हें रातोंरात सुपरस्टार बना दिया।
गीत “याहू! चाहे कोई मुझे जंगली कहे” ने उन्हें युवाओं का आइकन बना दिया।
अब शम्मी कपूर सिर्फ अभिनेता नहीं, बल्कि एक ट्रेंडसेटर थे।
रोमांस का नया चेहरा
शम्मी कपूर से पहले हिंदी सिनेमा में रोमांस सीमित और संकोची था। उन्होंने इसे खुला, जीवंत और उत्साही बनाया।
उनका रोमांस—
आंखों में शरारत
चेहरे पर मासूम मुस्कान
और शरीर में अथाह ऊर्जा से भरा होता था
उन्होंने शर्मिला टैगोर, मुमताज़, साधना, आशा पारेख, राजश्री जैसी अभिनेत्रियों के साथ यादगार फिल्में दीं।
स्वर्णिम दौर की प्रमुख फिल्में
शम्मी कपूर का करियर 1958 से 1970 तक अपने चरम पर रहा। इस दौरान उन्होंने एक से बढ़कर एक सुपरहिट फिल्में दीं—
• तुमसा नहीं देखा (1957)
• दिल देकर देखो (1959)
• जंगली (1961)
• कश्मीर की कली (1964)
• राजकुमार (1964)
• तीसरी मंज़िल (1966)
• अन ईवनिंग इन पेरिस (1967)
• ब्रह्मचारी (1968)
फिल्म “ब्रह्मचारी” के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला, जिसमें उन्होंने एक अनाथ बच्चों के संरक्षक की गंभीर भूमिका निभाई।
संगीत और शम्मी कपूर
शम्मी कपूर की फिल्मों का संगीत आज भी अमर है।
उन पर फिल्माए गए गीतों में एक अलग ही जोश दिखाई देता था।
संगीतकार शंकर–जयकिशन और गीतकार शैलेंद्र, हसरत जयपुरी के साथ उनका तालमेल अद्भुत था।
कुछ कालजयी गीत—
“याहू! चाहे कोई मुझे जंगली कहे”
“आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे”
“ओ हसीना ज़ुल्फों वाली”
“दीवाना हुआ बादल”
इन गीतों में शम्मी कपूर की ऊर्जा आज भी महसूस की जा सकती है।
ढलता दौर और चरित्र भूमिकाएँ
1970 के दशक में हिंदी सिनेमा में एंग्री यंग मैन का दौर आया और शम्मी कपूर की रोमांटिक छवि धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी। वजन बढ़ने के कारण भी उन्हें मुख्य भूमिकाएँ कम मिलने लगीं।
हालांकि, उन्होंने खुद को समय के साथ ढालते हुए चरित्र भूमिकाएँ स्वीकार कीं और एक बार फिर अपनी प्रतिभा साबित की।
महत्वपूर्ण चरित्र भूमिकाएँ—
• विधाता
• हीरो
• प्रेम रोग
• चांदनी
• अंदाज़ अपना अपना
• व्यक्तिगत जीवन
शम्मी कपूर का निजी जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहा। उन्होंने अभिनेत्री गीता बाली से विवाह किया, जिनकी असमय मृत्यु ने उन्हें गहरा आघात पहुँचाया। बाद में उन्होंने नीला देवी से विवाह किया।
व्यक्तिगत दुखों के बावजूद वे जीवन को हँसकर जीने वाले इंसान रहे।
तकनीक और इंटरनेट से लगाव
बहुत कम लोग जानते हैं कि शम्मी कपूर भारत में इंटरनेट अपनाने वाले पहले फिल्मी सितारों में से एक थे। वे तकनीक में गहरी रुचि रखते थे और ई-मेल, वेबसाइट और डिजिटल मंचों के समर्थक थे।
उन्हें “इंटरनेट का दादाजी” भी कहा जाता था।
सम्मान और विरासत
शम्मी कपूर को भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए कई सम्मान मिले—
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड
कई अंतरराष्ट्रीय समारोहों में विशेष सम्मान उनकी सबसे बड़ी विरासत वह ऊर्जा है, जो आज भी नई पीढ़ी के कलाकारों को प्रेरित करती है।
निधन और अमर स्मृति
14 अगस्त 2011 को शम्मी कपूर का निधन हो गया, लेकिन उनका अंदाज़, उनका “याहू” और उनका मुस्कुराता चेहरा आज भी हिंदी सिनेमा में जीवित है।
शम्मी कपूर केवल एक अभिनेता नहीं थे, वे एक युग थे। उन्होंने हिंदी सिनेमा के नायक की परिभाषा बदली और यह साबित किया कि अभिनय सिर्फ गंभीरता नहीं, बल्कि उत्सव भी हो सकता है।
आज जब भी हिंदी सिनेमा के इतिहास पर नज़र डाली जाती है, शम्मी कपूर का नाम चमकते सितारे की तरह सामने आता है—
एक ऐसा सितारा, जो कभी बुझा नहीं।

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