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गणेश जी आरती पूजन विधि

 


श्री गणेश जी की आरती, जन्म कथा एवं पूजन विधि

 श्री गणेश जी का जन्म कथा

पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की रचना की और उसे द्वारपाल नियुक्त कर दिया। जब भगवान शिव कैलाश लौटे और बालक ने उन्हें भीतर जाने से रोका, तो शिवजी क्रोधित हो गए और उन्होंने बालक का सिर काट दिया।
माता पार्वती के विलाप से संपूर्ण कैलाश शोक में डूब गया। तब शिवजी ने अपने गणों को आदेश दिया कि जो भी पहला जीव उत्तर दिशा की ओर मिले, उसका सिर ले आएँ। एक हाथी का सिर लाया गया और बालक के धड़ पर जोड़ दिया गया। इस प्रकार बालक गणेश कहलाए।
शिवजी ने वरदान दिया कि गणेशजी की पूजा सर्वप्रथम होगी और वे विघ्नहर्ता कहलाएँगे।

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 -:: श्री गणेश जी की पूजन विधि (संक्षिप्त व सरल) ::-

पूजन का शुभ समय: प्रातःकाल या गणेश चतुर्थी, बुधवार विशेष फलदायी।

सामग्री:

गणेश जी की मूर्ति/चित्र, दूर्वा घास (21 या 11)

मोदक या लड्डू, लाल पुष्प, रोली, अक्षत, दीपक, धूप, नैवेद्य


विधि:

स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें, पूजा स्थल शुद्ध करें।

चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर गणेश जी की स्थापना करें।

दीप प्रज्वलित कर गणेश मंत्र का जाप करें:
“ॐ गं गणपतये नमः” (11  बार)

रोली, अक्षत, पुष्प, दूर्वा अर्पित करें।

मोदक/लड्डू का भोग लगाएँ।

आरती करें और क्षमा प्रार्थना करें।


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     -:: श्री गणेश जी की आरती ::-

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

एकदंत दयावंत, चार भुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥
जय गणेश…

पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥
जय गणेश…

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
जय गणेश…

‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा॥


           -:: विशेष मान्यताएँ ::-

गणेश जी को दूर्वा अत्यंत प्रिय है।

किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश पूजन से विघ्न दूर होते हैं।

बुधवार को पूजा करने से बुद्धि, व्यापार और कार्य-सिद्धि में वृद्धि होती है।

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