भगवान विश्वकर्मा जी की पूजन विधि एवं आरती
भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि का प्रथम शिल्पकार एवं देवताओं का वास्तुकार माना जाता है। पुराणों के अनुसार वे ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैं। कुछ ग्रंथों में उन्हें अंगिरा ऋषि के वंशज तथा प्रभास ऋषि के पुत्र भी कहा गया है।
विश्वकर्मा जी ने स्वर्ग की रचना इंद्रपुरी, द्वारका, हस्तिनापुर, लंका जैसी महान नगरी देवताओं के दिव्य अस्त्र-शस्त्र (वज्र, पुष्पक विमान आदि) का निर्माण किया।
इसी कारण उन्हें देवशिल्पी, वास्तु के देवता और कर्म के अधिष्ठाता कहा जाता है।
हर वर्ष विश्वकर्मा जयंती (17 सितंबर) को श्रमिक, कारीगर, इंजीनियर, फैक्ट्री और मशीनों की पूजा करते हैं।
विश्वकर्मा जी की पूजन विधि
पूजा सामग्री
भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति या चित्र
लाल/पीला वस्त्र
रोली, चंदन, अक्षत
पुष्प, धूप, दीप
फल, मिठाई, पंचामृत
औजार, मशीन या कार्य उपकरण
पूजन क्रम
1. प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें
2. पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें
3. विश्वकर्मा जी की प्रतिमा स्थापित करें
4. दीप प्रज्वलित कर संकल्प लें
5. रोली, अक्षत, पुष्प अर्पित करें
6. औजार एवं मशीनों की पूजा करें
7. विश्वकर्मा मंत्र का जाप करें
मंत्र:
ॐ विश्वकर्मणे नमः
8. भोग लगाकर आरती करें
9. अंत में प्रसाद वितरण करें
भगवान विश्वकर्मा जी की आरती
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु
जय श्री विश्वकर्मा ।
सकल सृष्टि के कर्ता धर्ता,
सकल सृष्टि के ज्ञाता ॥
आदि अनादि अनूप रूप,
अखिल विश्व के स्रष्टा ।
ज्ञान बुद्धि विज्ञान प्रदाता,
सबके भाग्य विधाता ॥
जग के पालनहार प्रभु जी,
श्रम के देव कहाए ।
शिल्प कला के आप अधिष्ठाता,
विश्वकर्मा नाम धराए ॥
जो जन तुमको ध्यान करे,
उसका जीवन सफल हो जाए ।
कृपा दृष्टि बनाए रखना,
विश्वकर्मा आरती गाए ॥
॥ जय श्री विश्वकर्मा ॥
पूजन का महत्व:-
कार्य में सफलता
मशीन एवं औजारों की सुरक्षा
व्यवसाय में उन्नति
श्रमिकों और कारीगरों का कल्याण
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NEWS MiTAN BANDHU


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