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काल भैरव आरती एवं पूजन विधि

  काल भैरव उत्पत्ति, आरती एवं पूजन विधि



 काल भैरव जी की उत्पत्ति कथा


पुराणों के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी को अपने ज्ञान और सृष्टि-रचना का अहंकार हो गया। उन्होंने स्वयं को सर्वोच्च मान लिया।

यह अहंकार देखकर भगवान शिव ने अपने क्रोध से एक उग्र रूप प्रकट किया—काल भैरव।

काल भैरव ने ब्रह्मा जी के पाँचवें सिर का अहंकार नष्ट कर दिया। इस ब्रह्महत्या के प्रायश्चित हेतु भगवान शिव ने काल भैरव को आदेश दिया कि वे कपाल लेकर पृथ्वी पर भ्रमण करें।

इसी कारण काल भैरव को दंडाधिकारी, समय के स्वामी और काशी के कोतवाल कहा जाता है।


काल भैरव पूजन विधि (सरल एवं शास्त्रोक्त)

पूजन का उत्तम समय

रविवार या मंगलवार

कृष्ण पक्ष की अष्टमी (कालाष्टमी)

संध्या या रात्रि काल

पूजन सामग्री

काल भैरव जी की मूर्ति या चित्र

सरसों का तेल / दीपक

काले तिल, काले फूल

धूप, दीप, कपूर

नारियल, गुड़

मदिरा (ऐच्छिक, परंपरानुसार)

कुत्ते को देने हेतु रोटी



पूजन विधि

1. स्नान कर काले या गहरे वस्त्र धारण करें।

2. उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।

3. दीपक में सरसों का तेल डालकर प्रज्वलित करें।

4. काल भैरव का ध्यान करें।

5. काले फूल, काले तिल अर्पित करें।

6. “ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु काल भैरवाय नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें।

7. आरती करें।


8. अंत में कुत्ते को रोटी खिलाएँ—यह अत्यंत फलदायी माना गया है।


 काल भैरव जी की आरती


काल भैरव आरती


जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा।

जय काली और गौरा देवी कृत सेवा॥


तुम्ही पाप नाशक, दुख सिंधु तारक।

भक्तन के हो सहायक, जय भैरव देवा॥


कर त्रिशूल डमरू शोभित, गल मुंड माला।

कपाल हाथ में शोभे, नयन विशाल॥


वाहन श्वान विराजत, दरस भय हारी।

महिमा अगम अपार, जय भैरव देवा॥



          --::: काल भैरव पूजन के लाभ :::-

भय, शत्रु और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा

राहु-केतु दोष में शांति

अकाल मृत्यु का भय समाप्त

साहस, आत्मबल और सुरक्षा की प्राप्ति

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